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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]  »  श्लोक d72-d74
 
 
श्लोक  13.163.d72-d74 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नैव धीरो नियोजयेत्।
मन:षष्ठानि संयम्य नित्यमात्मनि योजयेत्॥
इन्द्रियाणां विसर्गेण दोषमृच्छत्यसंशयम्।
संनियम्य नु तान्येव तत: सिद्धिमवाप्नुयात्॥
षण्णामात्मनि युक्तानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति।
न च पापैर्न चानर्थै: संयुज्येत विचक्षण:॥
 
 
अनुवाद
धैर्यवान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी इंद्रियों को विषयों में न लगाए। उन्हें मन से वश में रखे और उन्हें सदैव ईश्वर के ध्यान में लगाए रखे। इंद्रियों को स्वतंत्र छोड़ने से अवश्य ही दोष उत्पन्न होते हैं और उन्हें वश में करने से व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करता है। जो विद्वान अपने मन को ईश्वर के चिंतन में लगाकर छहों इंद्रियों पर प्रभुत्व स्थापित करता है, वह पाप और बुराइयों से युक्त नहीं होता।
 
A patient person should not indulge his senses in objects. Control them with your mind and always keep them in meditation of God. Leaving the senses free definitely leads to faults and by controlling them, a person attains success. The scholar who establishes dominance over the six senses along with his mind engaged in the contemplation of God, is not associated with sins and evils.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)