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mahabharat 13.163.d71: इस लोक का यौन सुख और परलोक का महान दिव्य सुख - दोनों मिलकर भी काम-तृष्णा से प्राप्त सुख के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हो सकते।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d71 
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥
 
 
अनुवाद
इस लोक का यौन सुख और परलोक का महान दिव्य सुख - दोनों मिलकर भी काम-तृष्णा से प्राप्त सुख के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हो सकते।
 
The sexual pleasure of this world and the great divine pleasure of the next world - both together cannot equal even one sixteenth of the pleasure resulting from the quenching of desire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)