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mahabharat 13.163.d70: इस पृथ्वी पर जितने भी चावल, जौ, सोना, गाय-बैल और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जो मनुष्य यह देख और समझ लेता है, वह मोह में नहीं पड़ता।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d70 
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।
नालमेकस्य पर्याप्तमिति पश्यन् न मुह्यति॥
 
 
अनुवाद
इस पृथ्वी पर जितने भी चावल, जौ, सोना, गाय-बैल और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जो मनुष्य यह देख और समझ लेता है, वह मोह में नहीं पड़ता।
 
All the rice, barley, gold, cattle and women on this earth are not enough for a single man. A man who sees and understands this does not fall into temptation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)