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mahabharat 13.163.d67: सुखों की प्यास उन्हें भोगने से कभी शांत नहीं होती, बल्कि घी से प्रज्वलित अग्नि की तरह वह और भी अधिक बढ़ती जाती है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d67 
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
 
 
अनुवाद
सुखों की प्यास उन्हें भोगने से कभी शांत नहीं होती, बल्कि घी से प्रज्वलित अग्नि की तरह वह और भी अधिक बढ़ती जाती है।
 
The thirst for pleasures is never satiated by enjoying them; rather, like the fire lit by ghee, it only increases more and more.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)