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mahabharat 13.163.d58: यहाँ संग्रह से कोई लाभ नहीं है; क्योंकि संग्रह दोषों से भरा है। देवी! रेशम का कीड़ा संग्रह से ही बंधता है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d58 
अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रह:।
कोशकार: कृमिर्देवि बध्यते हि परिग्रहात्॥
 
 
अनुवाद
यहाँ संग्रह से कोई लाभ नहीं है; क्योंकि संग्रह दोषों से भरा है। देवी! रेशम का कीड़ा संग्रह से ही बंधता है।
 
There is no benefit here from collection; because collection is full of defects. Devi! The silkworm gets bound only by collection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)