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mahabharat 13.163.d56: धन के लोभ से तृष्णा कभी शांत नहीं होती। यदि तृष्णा या लोभ को आश्रय मिल जाए तो वह धधकती आग की तरह बढ़ने लगती है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d56 
धनलोभेन तृष्णाया न तृप्तिरुपलभ्यते।
लब्धाश्रयो विवर्धेत समिद्ध इव पावक:॥
 
 
अनुवाद
धन के लोभ से तृष्णा कभी शांत नहीं होती। यदि तृष्णा या लोभ को आश्रय मिल जाए तो वह धधकती आग की तरह बढ़ने लगती है।
 
Thirst is never satisfied by greed for money. If thirst or greed finds shelter then it starts increasing like a blazing fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)