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mahabharat 13.163.d50-d51: समस्त संचय का अंत विनाश है, समस्त उन्नति का अंत पतन है, संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है। उत्थान-पतन को स्वयं देखकर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि यहाँ सब कुछ क्षणिक और दुःखमय है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]  »  श्लोक d50-d51
 
 
श्लोक  13.163.d50-d51 
क्षयान्ता निचया: सर्वे पतनान्ता: समुच्छ्रया:।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
उच्छ्रयान् विनिपातांश्च दृष्ट्वा प्रत्यक्षत: स्वयम्।
अनित्यमसुखं चेति व्यवस्येत् सर्वमेव च॥
 
 
अनुवाद
समस्त संचय का अंत विनाश है, समस्त उन्नति का अंत पतन है, संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है। उत्थान-पतन को स्वयं देखकर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि यहाँ सब कुछ क्षणिक और दुःखमय है।
 
The end of all accumulations is destruction, the end of all progress is decline, the end of union is separation and the end of life is death. After seeing the rise and fall for yourself, one should decide that everything here is temporary and full of sorrow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)