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mahabharat 13.163.d47-d48: विद्वान पुरुष को परिवार, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, ऐश्वर्य और स्वास्थ्य में आसक्त नहीं होना चाहिए। स्वर्ग में रहने वाले देवताओं के राजा इंद्र को भी केवल सुख ही सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.163.d47-d48 
कुटुम्बपुत्रदाराश्च शरीरं धनसंचय:।
ऐश्वर्यं स्वस्थता चेति न मुह्येत् तत्र पण्डित:॥
सुखमेकान्ततो नास्ति शक्रस्यापि त्रिविष्टपे।
तत्रापि सुमहद् दु:खं सुखमल्पतरं भवेत्॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष को परिवार, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, ऐश्वर्य और स्वास्थ्य में आसक्त नहीं होना चाहिए। स्वर्ग में रहने वाले देवताओं के राजा इंद्र को भी केवल सुख ही सुख नहीं मिलता। वहाँ भी दुःख अधिक और सुख बहुत कम है।
 
A learned man should not be attached to family, son, wife, body, wealth, prosperity and health. Even the king of gods Indra who lives in heaven does not get only happiness. There too there is more sorrow and very little happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)