श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]  »  श्लोक d15-d16
 
 
श्लोक  13.163.d15-d16 
तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते।
अध्यात्मतत्त्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते॥
ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा।
यथावत् सम्प्रवक्ष्यामि तत् त्वमेकमना: शृणु॥
 
 
अनुवाद
वहाँ संसार चक्र के ज्ञान से मोक्ष का दर्शन होता है। अध्यात्म तत्त्व को भली-भाँति समझ लेना ही ज्ञान कहलाता है। हे प्रिये! मैं उस ज्ञान को प्राप्त करने की विधि और ज्ञानी पुरुष के आचरण का यथावत् वर्णन करूँगा। तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
 
There, salvation is seen through the knowledge of the cycle of the world. Understanding the spiritual principle well is called knowledge. Dear! I will describe the method of acquiring that knowledge and the conduct of a knowledgeable person in its proper form. Listen to it with your full attention.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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