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mahabharat 13.163.d108-d111: इस प्रकार समस्त पदार्थों की अनित्यता का निरन्तर चिन्तन करने से मनुष्य शीघ्र ही एक-दूसरे से विरक्त हो जाता है, जो मोक्ष का कारण है। उस व्याकुलता के कारण उसके मन में पुनः विमर्श उत्पन्न होता है। समस्त पदार्थों से उत्पन्न वैराग्य को ही विमर्श कहते हैं। शुभ! वैराग्य मनुष्य को महान शांति प्रदान करता है। निश्चयपूर्वक कहा गया है कि वैराग्य ही मुक्ति का निकटतम एवं दिव्य साधन है। देवि! यह वैराग्य उत्पन्न करने वाला कथन आपसे कहा गया है। इस प्रकार बार-बार चिन्तन करने से मोक्ष चाहने वाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]  »  श्लोक d108-d111
 
 
श्लोक  13.163.d108-d111 
एवं चिन्तयतो नित्यं सर्वार्थानामनित्यताम्।
उद्वेगो जायते शीघ्रं निर्वाणस्य परस्परम्॥
तेनोद्वेगेन चाप्यस्य विमर्शो जायते पुन:।
विमर्शो नाम वैराग्यं सर्वद्रव्येषु जायते॥
वैराग्येण परां शान्तिं लभन्ते मानवा: शुभे।
मोक्षस्योपनिषद् दिव्यं वैराग्यमिति निश्चितम्॥
एतत् ते कथितं देवि वैराग्योत्पादनं वच:।
एवं संचिन्त्य संचिन्त्य मुच्यन्ते हि मुमुक्षव:॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार समस्त पदार्थों की अनित्यता का निरन्तर चिन्तन करने से मनुष्य शीघ्र ही एक-दूसरे से विरक्त हो जाता है, जो मोक्ष का कारण है। उस व्याकुलता के कारण उसके मन में पुनः विमर्श उत्पन्न होता है। समस्त पदार्थों से उत्पन्न वैराग्य को ही विमर्श कहते हैं। शुभ! वैराग्य मनुष्य को महान शांति प्रदान करता है। निश्चयपूर्वक कहा गया है कि वैराग्य ही मुक्ति का निकटतम एवं दिव्य साधन है। देवि! यह वैराग्य उत्पन्न करने वाला कथन आपसे कहा गया है। इस प्रकार बार-बार चिन्तन करने से मोक्ष चाहने वाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है।
 
Thus, by constantly thinking about the impermanence of all objects, a person soon becomes detached from one another, which is the cause of liberation. Due to that agitation, discussion again arises in his mind. The detachment that arises from all objects is called discussion. Shubh! Dispassion brings great peace to human beings. It has been said with certainty that detachment is the nearest and divine means of liberation. Devi! This statement that generates detachment has been said to you. The person seeking liberation becomes free by thinking repeatedly in this manner.
 
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)