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mahabharat 13.163.d106-d107: यदि मनुष्य इस संसार में जन्म लेते और मरते हुए लोगों को देखकर भी वैराग्य अनुभव नहीं करता, तो वह चेतन नहीं, बल्कि लकड़ी या मिट्टी के टुकड़े के समान जड़ है। जो मनुष्य नाशवान है और जिसका जीवन निश्चित नहीं है, उसके लिए मित्र और संबंधियों को इकट्ठा करने से क्या लाभ? क्योंकि वह क्षण भर में सबको छोड़कर चला जाता है और कभी वापस नहीं आता।   |   mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]  »  श्लोक d106-d107
 
 
श्लोक  13.163.d106-d107 
जायमानांश्च सम्प्रेक्ष्य म्रियमाणांस्तथैव च।
न संवेगोऽस्ति चेत् पुंस: काष्ठलोष्टसमो हि स:॥
विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य
किं बन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च।
विहाय यद् गच्छति सर्वमेवं
क्षणेन गत्वा न निवर्तते च॥
 
 
अनुवाद
यदि मनुष्य इस संसार में जन्म लेते और मरते हुए लोगों को देखकर भी वैराग्य अनुभव नहीं करता, तो वह चेतन नहीं, बल्कि लकड़ी या मिट्टी के टुकड़े के समान जड़ है। जो मनुष्य नाशवान है और जिसका जीवन निश्चित नहीं है, उसके लिए मित्र और संबंधियों को इकट्ठा करने से क्या लाभ? क्योंकि वह क्षण भर में सबको छोड़कर चला जाता है और कभी वापस नहीं आता।
 
If a man does not feel detachment even after seeing the people taking birth and dying in this world, then he is not conscious, but is as inert as a piece of wood or clay. What is the use of collecting friends and relatives for a man who is perishable and whose life is not certain? Because he leaves everyone in a moment and goes away and never returns.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)