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mahabharat 13.162.d50: राजा को अपने राज्य की रक्षा के लिए या दुष्ट राजाओं द्वारा उत्पन्न संकटों से अपनी प्रजा को बचाने के लिए विधिपूर्वक युद्ध का मार्ग अपनाकर अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ता है।   |   mahabharat अध्याय 13.162: प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 162: प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]  »  श्लोक d50
 
 
श्लोक  13.162.d50 
स्वराज्यरक्षणार्थं वा कुनृपै: पीडिता: प्रजा:।
मोक्तुकामस्त्यजेत् प्राणान् युद्धमार्गे यथाविधि॥
 
 
अनुवाद
राजा को अपने राज्य की रक्षा के लिए या दुष्ट राजाओं द्वारा उत्पन्न संकटों से अपनी प्रजा को बचाने के लिए विधिपूर्वक युद्ध का मार्ग अपनाकर अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ता है।
 
The king must sacrifice his life in order to protect his kingdom or to rescue his subjects from the troubles caused by evil kings by following the path of war in a lawful manner.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)