श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 162: प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]  »  श्लोक d44-d46
 
 
श्लोक  13.162.d44-d46 
सोऽपि लोकान् यथान्यायं प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम्॥
जलावगाहनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे।
ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत् सुकृतं स्मरन्॥
सोऽपि पुण्यतमाँल्लोकान् निसर्गात् प्रतिपद्यते॥
 
 
अनुवाद
ऐसा व्यक्ति भी उपर्युक्त कर्मों को विधिपूर्वक करके पुण्यात्माओं के लोक को प्राप्त करता है। शुभ! यदि कोई जल में प्रवेश करना चाहे, तो उसे किसी प्रसिद्ध तीर्थ में पुण्य का चिंतन करते हुए उसी प्रकार डुबकी लगानी चाहिए। ऐसा व्यक्ति भी स्वाभाविक रूप से परम पुण्य लोकों को प्राप्त होता है।
 
Such a person also attains the world of virtuous souls by doing the above mentioned work in a proper manner. Shubh! If someone wants to enter the water, then he should immerse himself in the same way while thinking about virtue in some famous holy pilgrimage. Such a person also naturally goes to the most virtuous worlds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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