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mahabharat 13.161.d28: जब ब्राह्मण भोजन करके तृप्त हो जाएं, तब उन्हें भोजन को अपने पास रख लेना चाहिए और शेष भोजन दूसरों को दे देना चाहिए। तत्पश्चात, बहुत से लोगों तथा सेवकों के साथ स्वयं भी शेष भोजन ग्रहण करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d28
 
 
श्लोक  13.161.d28 
तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत्।
तच्छेषं बहुभि: पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नर:॥
 
 
अनुवाद
जब ब्राह्मण भोजन करके तृप्त हो जाएं, तब उन्हें भोजन को अपने पास रख लेना चाहिए और शेष भोजन दूसरों को दे देना चाहिए। तत्पश्चात, बहुत से लोगों तथा सेवकों के साथ स्वयं भी शेष भोजन ग्रहण करना चाहिए।
 
When the brahmins are satisfied after eating, then they should take it away and offer the remaining food to others. After that, a person along with many people and servants should eat the remaining food himself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)