श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d22
 
 
श्लोक  13.161.d22 
समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात् तदा।
तथा दर्भेषु पिण्डांस्त्रीन् निर्वपेद् दक्षिणामुख:।
अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम्॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अग्नि और सोम को आहुति देकर उनके समीप पितरों के लिए होम करें तथा दक्षिणाभिमुख होकर दाहिने कंधे पर जनेऊ अर्थात पवित्र धागा रखकर पितरों का नाम और गोत्र बोलते हुए कुशाओं पर तीन पिंड अर्पित करें। उन पिंडों को अंगूठे से नहीं छूना चाहिए।
 
In this way, after offering oblations to Agni and Soma, perform 'Homa' for the ancestors near them and face southwards, keeping the sacred thread i.e. sacred thread on the right shoulder and offering three Pindas on the Kushas while reciting the name and Gotra of the ancestors. Those bodies should not be touched by the thumb.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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