श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  13.161.d2 
श्रीमहेश्वर उवाच
पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मना: शृणु।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियाया: शुभाशुभम्॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवी! मैं पितृमेध का यथावत् वर्णन करूँगा, तुम एकाग्र होकर सुनो। मैं देश, काल, विधि और कर्म के शुभ-अशुभ फल का भी वर्णन करूँगा।
 
Shri Maheshwar said – Goddess! I will describe Pitrumedha as it is, you listen with concentration. I will also describe the auspicious and inauspicious results of the country, time, law and action.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd