| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d91 |
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| | | | श्लोक 13.160.d91  | श्रीमहेश्वर उवाच
गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत् तव शोभने।
कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम्॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री महेश्वर बोले- शोभने! अब मैं तुम्हें गुरुओं के पूजन की यथार्थ विधि बताता हूँ। वेदों का यही आदेश है कि कृतज्ञ मनुष्यों के लिए गुरुओं का पूजन परम धर्म है। | | | | Shri Maheshwar said-Shobne! Now I am telling you the exact method of worshiping the Gurus. This is the command of the Vedas that for grateful people, worship of Gurus is the supreme religion. | | ✨ ai-generated | | |
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