Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.160.d88: इस संसार में प्राणों से प्रिय कुछ भी नहीं है। इसलिए हमें सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। जैसे हम स्वयं पर दया चाहते हैं, वैसे ही हमें दूसरों पर भी दया करनी चाहिए। | mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न हि प्राणै: प्रियतमं लोके किंचन विद्यते।
तस्मात् प्राणिदया कार्या यथाऽऽत्मनि तथा परे॥
अनुवाद
इस संसार में प्राणों से प्रिय कुछ भी नहीं है। इसलिए हमें सभी जीवों पर दया करनी चाहिए। जैसे हम स्वयं पर दया चाहते हैं, वैसे ही हमें दूसरों पर भी दया करनी चाहिए।
There is nothing in this world as dear as life. Therefore, we should show mercy to all living beings. Just as we want mercy on ourselves, we should show mercy on others as well.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥