Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.160.d87: जो मनुष्य पूरे सौ वर्षों तक उत्तम तप करता है और जो सदा के लिए मांस का त्याग कर देता है - उसके ये दोनों कर्म एक ही हैं, अथवा एक नहीं भी हो सकते हैं [मांस का त्याग करना तप से भी श्रेष्ठ है]। | mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जो मनुष्य पूरे सौ वर्षों तक उत्तम तप करता है और जो सदा के लिए मांस का त्याग कर देता है - उसके ये दोनों कर्म एक ही हैं, अथवा एक नहीं भी हो सकते हैं [मांस का त्याग करना तप से भी श्रेष्ठ है]।
A man who performs excellent penance for a full hundred years and who gives up meat forever - these two actions of his are the same or may not be the same [giving up meat is even better than penance].
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥