| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d85 |
|
| | | | श्लोक 13.160.d85  | संछेदनं स्वमांसस्य यथा संजनयेद् रुजम्।
तथैव परमांसेऽपि वेदितव्यं विजानता॥ | | | | | | अनुवाद | | जिस प्रकार अपना मांस काटने से दुःख होता है, उसी प्रकार दूसरे का मांस काटने से भी दुःख होता है। यह बात प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को समझनी चाहिए। | | | | Just as cutting one's own flesh is painful for one, similarly cutting someone else's flesh also causes pain to him. Every wise person should understand this. | | ✨ ai-generated | | |
|
|