श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d78-d79
 
 
श्लोक  13.160.d78-d79 
यज्ञशेषं हवि:शेषं पितृशेषं च निर्मलम्॥
इति ते कथितं देवि भूय: श्रोतुुं किमिच्छसि॥
 
 
अनुवाद
यज्ञशेष (देवताओं को अर्पित किया गया शेष), हविशेष (अग्नि में अर्पित की गई आहुति से बचा हुआ) और पितृशेष (श्राद्ध से बचा हुआ) शुद्ध अन्न माने जाते हैं। हे देवी! यह विषय तो आपको बता दिया गया, अब आप और क्या सुनना चाहती हैं?
 
Yagyashesh (left over from offering to the gods), Havi:shesh (left over from offering offerings to the fire) and Pitrushesh (residual from Shraddha) are considered pure food. Goddess! This topic has been told to you, what more do you want to hear?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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