| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d70 |
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| | | | श्लोक 13.160.d70  | | तथैव जलसंशुद्धिर्यत् संशुद्धं तु संस्पृशेत्॥ | | | | | | अनुवाद | | इसी प्रकार, पानी की शुद्धता का भी ध्यान रखना ज़रूरी है। शुद्ध पानी ही छुएँ, उससे हाथ-मुँह धोएँ, कुल्ला करें और स्नान करें। | | | | Similarly, it is necessary to take care of the purity of water. Touch only pure water, wash your hands and face with it, rinse your mouth with it and take a bath. | | ✨ ai-generated | | |
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