| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d64 |
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| | | | श्लोक 13.160.d64  | श्रीमहेश्वर उवाच
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचमिष्यते।
मानसं सुकृतं यत् तच्छौचमाभ्यन्तरं स्मृतम्॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री महेश्वर बोले, "देवी! स्वच्छता दो प्रकार की मानी गई है - एक बाह्य स्वच्छता, दूसरी आन्तरिक स्वच्छता। जिसे पहले मानसिक सत्कर्म कहा गया था, उसे ही यहाँ आन्तरिक स्वच्छता कहा गया है।" | | | | Shri Maheshwar said- Devi! Cleanliness is considered to be of two types- one is external cleanliness, the other is internal cleanliness. What was earlier described as mental good deeds, the same is here called internal cleanliness. | | ✨ ai-generated | | |
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