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mahabharat 13.160.d62: व्रत के अंत में व्यक्ति को देवताओं और ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। इससे उसके कार्य में सफलता अवश्य मिलेगी।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d62
 
 
श्लोक  13.160.d62 
व्रतापवर्गकाले तु दैवब्राह्मणपूजनम्।
नरेण तु यथावद्धि कार्यसिद्धिं यथाप्नुयात्॥
 
 
अनुवाद
व्रत के अंत में व्यक्ति को देवताओं और ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। इससे उसके कार्य में सफलता अवश्य मिलेगी।
 
At the end of the fast, a person should worship the gods and Brahmins in the proper manner. This will ensure success in his work.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)