| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d6 |
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| | | | श्लोक 13.160.d6  | अनृतं यच्च परुषमबद्धं यच्च शंकरि।
असत्यं परिवादश्च पापमेतत् तु वाङ्मयम्॥ | | | | | | अनुवाद | | हे कल्याणकारी देवी! झूठ, कठोर और अप्रासंगिक वचन, मिथ्या भाषण और दूसरों की निन्दा - ये सब वाणी से किये जाने वाले पाप हैं। | | | | O Goddess who does good! The lies, harsh and irrelevant words spoken, false speech and criticism of others - all these are sins committed through speech. | | ✨ ai-generated | | |
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