| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d55 |
|
| | | | श्लोक 13.160.d55  | श्रीमहेश्वर उवाच
पूर्वमुक्तं तु यत् पापं मनोवाक्कायकर्मभि:।
व्रतवत् तस्य संत्यागस्तपोव्रतमिति स्मृतम्॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री महेश्वर बोले - देवी! मन, वाणी, शरीर और कर्म से जो पाप होते हैं, उनका वर्णन पहले किया जा चुका है। व्रत के समान उनका त्याग करने का व्रत लेना तपोव्रत कहलाता है। | | | | Shri Maheshwar said - Devi! The sins that are committed through the mind, speech, body and actions have been described earlier. Taking a vow to renounce them like a fast is called Tapovrata. | | ✨ ai-generated | | |
|
|