श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d50
 
 
श्लोक  13.160.d50 
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।
नास्ति सत्यात् परं दानं नास्ति सत्यात् परं तप:॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार नाव या जहाज समुद्र पार करने का साधन है, उसी प्रकार सत्य स्वर्ग तक पहुँचने की सीढ़ी है। सत्य से बड़ा कोई दान नहीं है और सत्य से बड़ा कोई तप नहीं है।
 
Just as a boat or ship is a means to cross the ocean, in the same way truth serves as a ladder to reach heaven. There is no greater charity than truth and there is no greater penance than truth.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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