श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d48-d49
 
 
श्लोक  13.160.d48-d49 
सुखाभिसंधिर्लोकानां सत्यं शौचमथार्जवम्।
व्रतोपवास: प्रीतिश्च ब्रह्मचर्यं दम: शम:॥
एवमादि शुभं कर्म सुकृतं नियमाश्रितम्।
शृणु तेषां विशेषांश्च कीर्तयिष्यामि भामिनि॥
 
 
अनुवाद
संसार के लोगों के सुख की कामना, सत्य, शौच, सरलता, व्रत, प्रेम, ब्रह्मचर्य, दम और शम - आदि शुभ कर्म नियमों पर आधारित सुकृत हैं। भामिनी! अब मैं इनके विशेष रहस्यों का वर्णन करूँगा, सुनो।
 
Desire for the happiness of the people of the world, truth, cleanliness, simplicity, fasting, love, celibacy, Dam and Sham - etc. auspicious deeds are Sukrit based on the rules. Bhamini! Now I will describe their special secrets, listen.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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