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mahabharat 13.160.d44: प्रिय! विकारों के निरोध को धर्म कहते हैं। संयम धर्म का पालन करने से जो धर्म प्राप्त होता है, वही सबसे अधिक कल्याणकारी है, अन्य कोई नहीं।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d44
 
 
श्लोक  13.160.d44 
तदेव धर्ममित्याहुर्दोषसंयमनं प्रिये।
यमधर्मेण धर्मोऽस्ति नान्य: शुभतर: प्रिये॥
 
 
अनुवाद
प्रिय! विकारों के निरोध को धर्म कहते हैं। संयम धर्म का पालन करने से जो धर्म प्राप्त होता है, वही सबसे अधिक कल्याणकारी है, अन्य कोई नहीं।
 
Dear! Restraint of vices is called Dharma. The Dharma that is achieved by following the Dharma of restraint is the most beneficial, not any other.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)