| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d42 |
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| | | | श्लोक 13.160.d42  | पापभीरुत्वमात्रेण दोषाणां परिवर्जनात्।
सुशोभनो भवेद् देवि ऋजुर्धर्मव्यपेक्षया॥ | | | | | | अनुवाद | | हे देवी! पाप से डरकर, दुर्गुणों का त्याग करके तथा सात्विक धर्म की अपेक्षा करके मनुष्य अच्छे फल का अधिकारी होता है। | | | | Goddess! By being afraid of sin, renouncing vices and expecting honest religion, a person is entitled to good results. | | ✨ ai-generated | | |
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