श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  13.160.d4 
मन:पूर्वं तु वा कर्म वर्तते वाङ्मयं तत:।
जायते वै क्रियायोगमनु चेष्टाक्रम: प्रिये॥
 
 
अनुवाद
प्रिय! पहले मन से कर्म का चिंतन किया जाता है, फिर वाणी से उसे प्रकाश में लाया जाता है। तत्पश्चात कर्म द्वारा उसे सिद्ध किया जाता है। इसके साथ ही प्रयास की प्रक्रिया भी चलती रहती है।
 
Dear! First the action is contemplated through the mind, then it is brought to light through speech. Thereafter it is accomplished through action. Along with this the process of effort continues.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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