| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d36 |
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| | | | श्लोक 13.160.d36  | त्रैविध्यदोषोपरमे यस्तु दोषव्यपेक्षया।
स हि प्राप्नोति सकलं सर्वदुष्कृतवर्जनात्॥ | | | | | | अनुवाद | | मन, वाणी और शरीर तीनों दोषों के नष्ट हो जाने पर जो दोषों की उपेक्षा कर देता है और सभी बुरे कर्मों का त्याग कर देता है, उसे सभी शुभ कर्मों का फल प्राप्त होता है। | | | | After the elimination of all the three defects of the mind, speech and body, the one who ignores the defects and abandons all bad deeds, gets the fruits of all the auspicious deeds. | | ✨ ai-generated | | |
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