| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d31 |
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| | | | श्लोक 13.160.d31  | एवं बहुविधा दोषा: पानपे सन्ति शोभने।
केवलं नरकं यान्ति नास्ति तत्र विचारणा॥ | | | | | | अनुवाद | | शोभने! इस प्रकार मदिरा पीने वालों में अनेक दोष हैं। वे तो नरक में ही जाते हैं, इसमें सोचने की कोई बात नहीं है। | | | | Shobhane! There are many faults in those who drink liquor like this. They simply go to hell, there is nothing to think about this. | | ✨ ai-generated | | |
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