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mahabharat 13.160.d297-d298: हे देवी! जो मनुष्य मन्दिर में देवता का अनुष्ठान करके उत्सव मनाता है और शुद्ध होकर विधिपूर्वक यज्ञ करके तथा उन्हें दान देकर देवताओं को संतुष्ट करता है, वह धर्म का पूर्ण फल प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d297-d298
 
 
श्लोक  13.160.d297-d298 
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं य: करोति वै।
यागान् देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि॥
देवान् संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात्॥
 
 
अनुवाद
हे देवी! जो मनुष्य मन्दिर में देवता का अनुष्ठान करके उत्सव मनाता है और शुद्ध होकर विधिपूर्वक यज्ञ करके तथा उन्हें दान देकर देवताओं को संतुष्ट करता है, वह धर्म का पूर्ण फल प्राप्त करता है।
 
Devi! He who celebrates the festival by performing the rituals of the deity in the temple and after becoming pure, satisfies the deities by performing the Yajna and offering gifts to them in a proper manner, he attains the full fruits of religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)