| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d29 |
|
| | | | श्लोक 13.160.d29  | विनष्टो ज्ञानविद्वद्भ्य: सततं कलिभावग:।
परुषं कटुकं घोरं वाक्यं वदति सर्वश:॥ | | | | | | अनुवाद | | वह सब प्रकार से नष्ट होकर विद्वान् एवं विवेकशील पुरुषों से झगड़ा करता है तथा कठोर, कटु एवं भयंकर वचन बोलता रहता है। | | | | Being ruined in every way, he quarrels with learned and prudent men. He keeps speaking harsh, bitter and terrible words. | | ✨ ai-generated | | |
|
|