श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d289-d291
 
 
श्लोक  13.160.d289-d291 
ब्राह्मणा: क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायश: स्मृता:॥
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितै:।
सुशुद्धैर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधि॥
शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चय:॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मणों और क्षत्रियों की उत्पत्ति प्रायः यज्ञ के लिए ही मानी गई है। शास्त्रों का यही निर्धारण है कि यज्ञ शुद्ध यजमानों और ऋत्विजों तथा वेदों में वर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों से तथा शुद्ध भौतिक उपकरणों से ही करना चाहिए।
 
The origin of Brahmins and Kshatriyas is generally considered to be for Yagya only. This is the determination of the scriptures that the Yajna should be performed with the pure Yajamanas and Ritvijas and the Yagyas described in the Vedas such as Agnisthoma etc. and with pure material instruments.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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