Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.160.d286: ऐसा समझकर जो ब्राह्मण सदैव अपनी पत्नी के साथ रहता है और ब्राह्मण-धर्म में तत्पर होकर यज्ञ करता है, वह मृत्यु के बाद पुण्य लोक को प्राप्त होता है। | mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एवं विज्ञाय तत् कर्ता सदार: सततं द्विज:।
प्रेत्यभावे लभेल्लोकान् ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
अनुवाद
ऐसा समझकर जो ब्राह्मण सदैव अपनी पत्नी के साथ रहता है और ब्राह्मण-धर्म में तत्पर होकर यज्ञ करता है, वह मृत्यु के बाद पुण्य लोक को प्राप्त होता है।
Understanding this, a Brahmin who always stays with his wife and performs Yajnas, by being devoted to Brahmanical duties, attains the virtuous world after death.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥