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mahabharat 13.160.d283: उमान ने कहा - प्रभु! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञ श्रेष्ठ कहे गए हैं। अतः आप कृपा करके मुझसे इस विषय का वर्णन करें।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d283
 
 
श्लोक  13.160.d283 
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते।
लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उमान ने कहा - प्रभु! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञ श्रेष्ठ कहे गए हैं। अतः आप कृपा करके मुझसे इस विषय का वर्णन करें।
 
Uman said – Lord! Devdeveshwar! Lokik and Vedic Yagyas are said to be the best. So please describe this topic to me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)