श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d277
 
 
श्लोक  13.160.d277 
मार्गकृत् सततं मर्त्यो भवेत् संतानवान् पुन:।
कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत् सततं भवेत्॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव सड़कें बनवाता है, उसे संतान की प्राप्ति होती है और जो व्यक्ति पानी में प्रवेश के लिए सीढ़ियाँ और पक्के घाट बनवाता है, वह शारीरिक दोषों से मुक्त हो जाता है।
 
A person who always builds roads, gets children. And one who builds stairs and cemented ghats for entering water, gets free from physical defects.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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