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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d256
 
 
श्लोक  13.160.d256 
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम्।
तस्य तस्य फलं ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने पूछा, "प्रभु! देवदेवेश्वर! तिलकदान कैसे करना चाहिए? और इसका क्या फल मिलता है? कृपया मुझे यह बताइए।"
 
He asked-Lord! Lord Devdeveshwar! How should Tilaka Daan be done? And what is the result of doing it? Please tell me this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)