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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d244
 
 
श्लोक  13.160.d244 
अत: परं प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि।
कन्या देया महादेवि परेषामात्मनोऽपि वा॥
 
 
अनुवाद
अब मैं तुम्हें कन्यादान का माहात्म्य विस्तार से बताता हूँ। महादेवी! तुम्हें अपनी कन्या के साथ-साथ दूसरों की कन्या का भी दान करना चाहिए।
 
Now I will tell you the significance of Kanya Daan in detail. Mahadevi! You should donate your own daughter as well as others'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)