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mahabharat 13.160.d238: जो लोग अपनी भूमि अग्निहोत्री, उत्तम व्रतों का पालन करने वाले और सदाचारी ब्राह्मण को देते हैं, वे कभी यमलोक नहीं जाते।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d238
 
 
श्लोक  13.160.d238 
ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम्।
ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम्॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अपनी भूमि अग्निहोत्री, उत्तम व्रतों का पालन करने वाले और सदाचारी ब्राह्मण को देते हैं, वे कभी यमलोक नहीं जाते।
 
Those who give their land to an Agnihotri, one who observes the best fasts and is a virtuous Brahmin, never go to Yamaloka.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)