श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d236
 
 
श्लोक  13.160.d236 
निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम्।
विमुक्त: कलुषै: सर्वै: शक्रलोकं स गच्छति॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य काटी हुई फसल से युक्त भूमि ब्राह्मणों को दान करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर इन्द्रलोक को जाता है।
 
He who donates the land containing the harvested crops to the Brahmanas, becomes free from all sins and goes to Indraloka.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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