| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d235 |
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| | | | श्लोक 13.160.d235  | हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम्।
सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा॥ | | | | | | अनुवाद | | जिस भूमि पर सुन्दर कुआं और रहने के लिए मकान हो, जो जोती हुई हो और जिसमें बीज सहित फल उगते हों, उस भूमि पर दान करना चाहिए। यह सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। | | | | Donation should be made on a plot where there is a beautiful well and a house to live in, which has been ploughed and where fruits along with seeds are grown. It is the one that fulfils all the wishes. | | ✨ ai-generated | | |
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