| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d22 |
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| | | | श्लोक 13.160.d22  | कलिं ते कुर्वतेऽभीष्टं प्रहरन्ति परस्परम्।
क्वचिद् धावन्ति सहसा प्रस्खलन्ति पतन्ति च॥ | | | | | | अनुवाद | | वे अपनी-अपनी मर्ज़ी से आपस में झगड़ते हैं, एक-दूसरे को मारते-पीटते हैं। कभी अचानक भागने लगते हैं, तो कभी लड़खड़ाकर गिर पड़ते हैं। | | | | They quarrel among themselves as per their wish and beat each other. Sometimes they suddenly start running, sometimes they stumble and fall. | | ✨ ai-generated | | |
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