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mahabharat 13.160.d218: जो मनुष्य समान रंग वाली, शुद्ध, दूध देने वाली तथा वस्त्र से ढककर गाय का दान करता है, उसे अग्निलोक में सम्मान प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d218
 
 
श्लोक  13.160.d218 
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम्।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य समान रंग वाली, शुद्ध, दूध देने वाली तथा वस्त्र से ढककर गाय का दान करता है, उसे अग्निलोक में सम्मान प्राप्त होता है।
 
He who makes donation of a cow, having a calf of the same colour, simple and pure, and giving milk, after covering it with a cloth, attains respect in the world of fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)