श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d212
 
 
श्लोक  13.160.d212 
कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये।
प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान्॥
 
 
अनुवाद
दुर्बल, जीविकाहीन, बहुत पुत्रों वाले, अग्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मण को दूध देने वाली स्वस्थ गाय का दान करने से दाता उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।
 
By donating a healthy cow that gives milk to a weak, without livelihood, having many sons, Agnihotri, Shrotriya Brahmin, the donor attains the best worlds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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