श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d206
 
 
श्लोक  13.160.d206 
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते।
न हि गोभ्य: परं दानं विद्यते जगति प्रिये॥
 
 
अनुवाद
अनिंदिते! इसके बाद मैं गौदान का वर्णन करूँगा। हे प्रिये! इस संसार में गौदान से बढ़कर कोई दान नहीं है।
 
Anindite! After this I will describe the donation of cows. Dear! In this world there is no greater donation than the donation of cows.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd