| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण] » श्लोक d193 |
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| | | | श्लोक 13.160.d193  | विवस्वतश्च सोमस्य ब्रह्मणश्च प्रजापते:।
विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदा:॥ | | | | | | अनुवाद | | जो मनुष्य सदैव संसार को अन्न और जल का दान करते हैं, वे सूर्य, चन्द्रमा और प्रजापति ब्रह्माजी के लोकों में जाते हैं। | | | | People who always donate food and water to the world go to the worlds of Sun, Moon and Prajapati Brahmaji. | | ✨ ai-generated | | |
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