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mahabharat 13.160.d186: चांडाल और शूद्र को भी अन्नदान निंदनीय नहीं है। इसलिए ईर्ष्या छोड़कर अन्नदान का पूरा प्रयत्न करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 160: शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार-शुद्धि, मांसभक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास-विधि, ब्रह्मचर्यपालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, पुण्यतम देश-काल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक-वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण]  »  श्लोक d186
 
 
श्लोक  13.160.d186 
अपि चाण्डालशूद्राणामन्नदानं न गर्ह्यते।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्नममत्सर:॥
 
 
अनुवाद
चांडाल और शूद्र को भी अन्नदान निंदनीय नहीं है। इसलिए ईर्ष्या छोड़कर अन्नदान का पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
 
Donation of food to even Chandalas and Shudras is not condemnable. Therefore, leaving aside jealousy, one should make every effort to donate food.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)